‘द वायर’ की पत्रकार आरफा खानम बनी महिला इमाम, दिया फतवा- ‘साम्प्रदायिक हैं भारत माता की जय’

वंदे मातरम मित्रों! आजकल कुछ नासमझ लोगों ने “भारत माता की जय” को सांप्रदायिक घोषित कर दिया हैं, ये लोग समय समय पर अपनी भष्ट्र दोहरी मानसिकता का परिचय देते रहते हैं। ट्विटर पर “द वायर” की वरिष्ठ पत्रकार आरफा खानम शेरवानी ने बाकायदा ट्वीट करके “भारत माता की जय” को सांप्रदायिक नारा बता डाला। आइए विस्तार से इनके ट्वीट्स पर नजर डालकर विवेचना करते हैं।

ट्रिपल तलाक बिल लोकसभा में एकमत से सभी सांसदों ने “भारत माता की जय कहते हुए सहमति से पास करवाया। इस पर महोदया ने ट्वीट किया :

— महोदया इस पर कानून मंत्री और भाजपा सरकार पर तंज करते हुए आरोप लगाती हैं कि वे लोग धर्म-निरपेक्षता की बात करते हैं, और “भारत माता की जय” कहना क्या उसका प्रमाण है? वैसे सांसदों ने भारत माता की जय का घोष किया है और इसमें किसी भी धर्म विशेष की तारीफ नहीं की गई है ये सवा सौ करोड़ लोगों के देश के विजय का घोष था जिसकी नागरिक स्वयं वो हैं। चूंकि पूरी लोकसभा में एकमत से ये जयघोष हुआ है तो इसमें केवल एक पार्टी और उसके सांसदों पर आरोप लगाना तर्कसंगत भी कैसे हो सकता है।

इसके बाद एक ट्विटर यूजर, महोदया से साफ शब्दों में स्पष्टीकरण मांगता है कि क्या “भारत माता की जय” कहना साम्प्रदायिक है? महोदया जबाब देती हैं :

— महोदया, यहां पर बिना ये जाने कि वे किस धर्म के यूजर को सम्बोधित कर रही हैं, ये आरोप मढ़ देती हैं कि देश को एक देवी के रूप में देखना एक से ज्यादा ईश्वर मानने वालों के मनगढ़ंत विचारों पर आधारित है, जो एक ईश्वर में विश्वास करते हैं, उन पर भारत माता की जय बुलवाना जबर्दस्ती करना है। महोदया जैसे अज्ञानियों की जानकारी के लिए बता दूँ, बहुदेव प्रथा यानि एक से ज्यादा ईश्वर होना सनातन धर्म का हिस्सा नहीं हैं। ईश्वर एक है निराकार है, समस्त सनातन धर्मी इस बात को जानते हैं। निरंकारी, हठयोगी आदि ऐसे ही ईश्वर में विश्वास करते हैं।

अब सवाल ये उठता है कि “भारत माता की जय” में से यदि “माता” हटा भी दिया जाए तो क्या महोदया इसका जयघोष करेंगी? तार्किक रूप से नहीं! इसका कारण है कि ये देश से पहले रखती हैं, स्वयं को और स्वयं से पहले रखती हैं अपना मजहब। जैसे किसी पार्टी का उम्मीदवार जीतता है तो हिंदी भाषी कहते हैं – अमुक व्यक्ति की जय जबकि उर्दू भाषी कहते हैं – अमुक व्यक्ति ज़िंदाबाद। भारत माता की जय कहना भी ठीक वैसा ही है, यदि मजहबी पाखंडियों को माता से दिक्कत है तो वे “भारत की जय” बोल सकते हैं और उन्हें ऐसा इसलिए करना चाहिए क्योंकि वे किसी व्यक्ति विशेष की जय और ज़िंदाबाद भी बोलते हैं। संसद में तीन तलाक का बिल स्त्री स्वाभिमान का प्रतीक होना चाहिए लेकिन महोदया न “भारत माता” पर आपत्ति जताकर पहले तो देश से पहले स्वयं को रखा उसके बाद, स्त्री की गरिमा से पहले रखा अपना मजहब। महोदया को याद दिलाना चाहूंगा कि जब समस्त भारत अपनी आजादी के लिए संघर्ष कर रहा था तब आपके मजहब के कुछ आप जैसी मानसिकता के लोगों की प्राथमिकता “तुर्की के खलीफा” का सम्मान “भारत देश की आजादी” और स्वयं की आजादी से बड़ी प्राथमिकता पर था। वो तो शुक्र है आपके मजहब में अशफ़ाक़ उल्ला खां जैसे देशभक्त भी जन्में हैं जिन्होंने इस माटी के गौरव के लिए अपने प्राणों की आहूति तक दे दी। “भारत माता की जय” पर आपत्ति जताने से पहले हिंदुओं का न सही तो कम से कम “अशफाक उल्ला खां” और “A P J अब्दुल कलाम” जैसे देशभक्त मुसलमानों की तो इज्जत की होती।

महोदया की बात पर आपत्ति जताते हुए बहुत सारे ट्विटर यूज़र्स ये उदाहरण देते हुए नजर आए कि ये माटी हमारी मातृभूमि है अगर हम ही इसका सम्मान नहीं करेंगे तो कौन करेगा? रामायण में “जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी” लिखा है। लेकिन महोदया जैसे लोगों को हिंदुओं के ग्रन्थों के उदाहरण देना अनुचित है क्योंकि इनके अनुसार धर्मनिरपेक्षता और उदारवाद का पूरा ठेका एक ही समुदाय को लेना चाहिए इनके मजहब में ज़रा सी भी गुंजाइश नहीं। “मूर्तिपूजक काफिर होते हैं” ये हमें पता है कि ऐसी आपकी मानसिकता है, तो थोड़े से भी उदारवाद की उम्मीद कैसे करें आपसे? अरे हम तो उस समुदाय से आते हैं, आप उदारवादी बनकर तो देखिए कैसे आपको अब्दुल कलाम की तरह सर आंखों पर न बिठायें तो कहना।

आगे जबाब में महोदया लिखती हैं :

— महोदया! आपकी जानकारी के लिए बता दूँ, किसी विषय पर पहले आता है “दबाव” उसके बाद प्रतिरोध में आती है “आपत्ति”। आप लोगों जैसे स्वघोषित डरे सहमे लोगों ने पहले ही “भारत माता की जय” बोलने पर आपत्ति जता दी, दबाब डालने का मौका ही कहाँ दिया बहुसंख्यक आबादी को? यदि मैं गलत हूँ तो एक उदाहरण गिनवा दीजिये कि इस मुद्दे पर सबसे पहले आपत्ति किस बहुसंख्यक के दबाब के बाद जताई गई थी? आपके पास जबाब नहीं होगा क्योंकि यहां आपत्ति जैसी कोई स्थिति ही नहीं है, आप लोग बस उस मजहबी फतवे को मान रहे हो जो कहता है “भारत माता की जय” कहना गैर-इस्लामिक है और हराम है।

मोहतरमा! अगर भारत माता कहना हराम होता हो एक 14-15 वर्ष का बालक चंद्रशेखर खुशी खुशी बेतों की मार “भारत माता की जय” कहकर न सह पाता और न ही देश की जनता उसे “आजाद” सम्बोधित करके अपना नायक मानती। “भारत माता की जय” कहना यदि हराम होता तो सैकड़ो क्रांतिकारी भरी जवानी में फांसी के फंदे को खुशी खुशी चूमने की हिम्मत न कर पाते। भारत माता की जय कहना अगर हराम होता तो -50℃ में सियाचिन ग्लेशियर पर सलटोरों रेंज की चोटियों पर 4000-5000 मीटर की ऊंचाई पर मृत्युतुल्य परिस्थितियों में हमारे जवान रहकर हमारी रक्षा करने का साहस नहीं कर सकते थे।

हमारा धर्म, हमारे पूर्वजों की शिक्षा हमें ये संस्कार देती है कि हम अपनी मातृभूमि से प्यार करें और ये तो सबको पता है सबसे शुद्ध प्यार माँ-औलाद का ही होता है इसलिए प्रेम की वरिष्ठतम व्याख्या के लिए देश की ज्यादातर जनसंख्या “भारत” को “माता” कहकर अपना स्नेह और सम्मान प्रकट करती है। हालांकि कुछ लोगों को बुजर्गों से दूसरे संस्कार मिलते हैं और वे MF हुसैन की तरह किसी 18+ चलचित्र की कल्पना करते हुए ‘भारत माता’ की अर्द्धनग्न पेंटिंग बना देते हैं और यहां उनका मजहब आड़े नहीं आता जब वे अपनी मातृभूमि को माता रूप दे रहे होते हैं। अगर तर्क के आधार पर देखा जाए तो इस्लाम पेटिंग की इजाजत नहीं देगा, यदि देगा भी तो भारत माता को देवी के रूप में प्रदर्शित करने की इजाजत नहीं देगा चूंकि MF हुसैन ने दोनों चीजें करके पहले तो इस्लाम को शर्मसार किया और उसके बाद माता को अर्द्धनग्न दिखाकर अपनी मानसिक विकृति का परिचय दिया। मैं पूरे दावे के साथ कह सकता हूँ कि महोदया MF हुसैन का भी समर्थन करती क्योंकि न तो इन्हें इस्लाम की तालीम से लेना देना है न ही स्त्री की गरिमा का सम्मान करना जानती हैं क्योंकि दोनों ही परिस्थितियों में कोई स्त्री ऐसी सोच का समर्थन नहीं करेगी।

आरफा खानम कहती हैं, “मुझे आजादी दे मेरे देश को माता, पिता, बहन कहने के लिए मजबूर ना करें।”

पूरी आजादी हैं आप माता पिता देश को ना कहे, लेकिन यही आजादी आप दूसरे को भी तो दे कि अपने देश के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए उसे माता पिता बहन बिना किसी साम्प्रदायिकता के ठप्पे के साथ खुलकर बोल सके, आप तो महिला इमाम की तरह फतवे जारी कर रही हैं। भारत माता की जय के नारे लगाने वाले को सांप्रदायिक होने का प्रमाणपत्र बाँट रही हैं।

गौरतलब हैं, आरफा खानम बेहद साम्प्रदायिक मानसिकता की हैं। अगर हिन्दू अपराधी हैं तो यह चाहती हैं कि मुद्दा जोर-शोर से उठे, वही, अगर मुस्लिम अपराधी हैं तो यह चाहती हैं कि उस पर चर्चा भी ना हो क्योकि उससे साम्प्रदायिकता बढ़ती हैं। इनकी पूरी पत्रकारिता जहर फैलाने पर टिकी हुई हैं। हाल में यह तब निशाने पर आ गयी थी जब इन्होंने आजतक के पत्रकार रोहित सरदाना को ट्रोल करने का प्रयास किया था।

इनका पूरा कच्चा चिट्ठा जानने के लिए यहाँ क्लिक करें।

अंत में महोदया से इतना कहना चाहूंगा कि वे अपना ध्यान दारुल-उलूम के जैसे फतवे मानने की वजाय कुरान पढ़ें, जैसे कि सनातन धर्म में लोग पुजारियों की बात मानने की बजाय गीता-रामायण में लिखी अच्छी बातें पढ़ते हैं। महोदया को मुस्लिम बहुल इंडोनेशिया से तालीम लेनी चाहिए जिसे गणेश जी के चित्र से कोई आपत्ति नहीं चाहे फिर वो मंदिरों में या मुद्रा पर, यदि ये कुरान-शरीफ या इस्लाम के विरुद्ध होता तो वहां के मुसलमान भी इसका विरोध कर रहे होते।

दूसरों से उदारता की अपेक्षा रखने से पहले स्वयं तो उदार बनना सीखिए, ये दुनियाँ तभी चलेगी। कम शब्दों में मोहतरमा को यही सलाह है कि यदि आने वाली पीढ़ियों में आप ऐसी ही नफरत भरेंगी तो वो पीढियां आपके मजहब के बाकी मुल्कों की तरह ही बंदूक उठाकर जिहाद करेंगी और ये जेहाद वो नहीं होगा जो कुरान-शरीफ में लिखा है। “खून बहाने” से काफी ज्यादा आसान है “भारत माता की जय” कहना।

शुक्र है, आप जैसे मुसलमान न स्वतंत्रता संग्राम में शामिल थे, न ही आजाद हिंद फौज में, क्योंकि न तो स्वतंत्रता संग्रामी मुसलमानों को भारत माता से दिक्कत थी न ही आजाद हिंद फौज के सेनानियों को। ये दिक्कत बस आप जैसे चुनिंदा लोगों को है जो भारत और इस्लाम दोनों पर कलंक लगा रहे हैं और सोते हुए मुद्दों को इसलिए जला रहे हैं ताकि आपकी नफरत की आग में आपकी रोटियां सिकती रहें। पत्रकार साहिबा! सुधर जाइये, अब हम प्रोपेगैंडा में फंसेंगे नहीं, बल्कि उसको तार तार करे देंगे क्योंकि ये है नया भारत। जय हिंद, वंदे मातरम, भारत माता की जय ??????

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